निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति के मूल
बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटत न हिय को शूल ।
अ से ज्ञ तक ज़िन्दगी
अ से अग्यानी,अन्जान, धरती बन रही जिंदा शमशान,
आवाज़,आग,आशिक,जो बन गयी आज की जनता,
एक इकबाल,इस छोटे से नाम पर करे सब बवाल,
अरे क्यों ऐसा होता है?ह से हिन्दू म से मुस्लिम होता है,
तो ये हम अलग क्यों होता है?
इमारतें बड़ी-बड़ी बनायीं लोगों ने,
खून की मेहनत लगायी मजदूरों ने,
पैसा कमाया सोषक ने,खून जलाया गरीब ने,
उल्टा पुल्टा सारा संसार,
गिरता हुआ अच्छा व्यापार और उठता हुआ काला व्यापार,
उन में वोह मजबूती नहीं रही ,
रिश्तों की कतार से सब कट गया,
न रहा बाप बाप,न भाई भाई,कोई ना रहा अपना,
सब हो गया एक डरावना सपना,
ऋषि साधू अब कोई नहीं,सब मांस सबका खाते हैं,
शाम होने पर सब मैख़ाने जाते हैं,
एलान-ऐ-ज़िन्दगी बन गयी,एक ठूंठ सी तन गयी,
कड़क इतनी हो गयी,एक हवा तो आये ये यहाँ गिरी या वहां गिरी,
ऐनक पहन के दुनिया को देखो,साफ़ नज़र नहीं आएगी,
सावधानी रखो बरकरार नहीं तो,धुल आँखों में घुस जायेगी,
ओ ईश्वर ! सुन रहा है है क्या?
देख रहा है यह अत्याचार,
यह खून खराबा,
क्यों तू चुप है?बैठा॥
कठपुतलियों को घुमा-घुमा कर तू भी खेलता है खेल,
औरत का मान सम्मान रखना ,
करता हूँ मैं गान ऐ धरती माता,
तुझसे न टूटेगा यह मेरा नाता,
अंगारे सी गर्मी भरकर,
सीने में दबाकर बैठा हूँ,
असंभव इस गरमी को प्यार की बर्फ से दबा के बैठा हूँ,
कल मिलेगा कल से बेहतर,
कर सका तो बेहतर से बहतर,न किया तो बदतर से बदतर,
खून से खेलेंगे क्या?दर्द को झेलेंगे क्या ?
नहीं ,नहीं सबका जवाब ,
सरहद पे मरने वालों का है क्या कोई हिसाब,
क्यों हैं इतने खुनी ,पापी लोग,
गलत हाथों से बना है घडा,
थोडा बचा के रखना पड़ता है,
पाप की कोख में पलने वाला हत्यारा बिना मौत के ही मरता है,
घने काले अँधेरे राह नज़र नहीं आयेगी,
एक किरण की कल्पना तो कर,राह खुद ही खुल जायेगी,
चन्दन को घिस घिस कर सर पर लगा लो खुसबू बहूत आयेगी,
पर ये चन्दन की लकड़ी बाहर की ही दुर्गन्ध मिटाएगी,
छलिया के रूप में,इस ख़ुशी की धूप में,
जहाज के पंछी के भाँती स्वछंद,उन्मुक्त,स्वतंत्र आकाश में विहार करो,
उन्मुक्त एक ऊंची उड़ान भरो,
पर संभालना प्यारे,ऊंचा जाकर निचे का भी ख्याल करना,
एक सच्चई याद रखना सबको है इक दिन मरना,
झील से प्रबलता लेकर,ऊंचाई से कूद जाना,गहरी मज़बूत चट्टानों,
को तोड़कर अपनी एक राह बनाना,
टूट ना जाना मिश्किल हालत में,
जब कोई ना हो तेरे साथ में,
बस हिम्मत रखना हाथ में,
तब किस्मत भी रहेगी तेरे साथ में,
ठंडी बर्फ की चादर सा बिछ जाना विडाल,विशाल पहाड़ियों पर,
दूर सूनी राहों पर यूं ही कर लेना सफ़र,
डगमगाना नहीं,घबराना नहीं,सब समझ कर ख्वाब,करना एक सही राह का चुनाव,
ढीला भी थोडा बन कर रहना,कभी कभी दर्द भी सहना,
क्योंकि साहस है गहना,तो धैर्य है ढाल,
तलवार से ढाल लेकर,यह सारा संसार देखकर,
तू मत घबराना,तुझे हटाने के लिए खुद विधाता को पड़ेगा आना,
थाल अम्बर सा बनकर,सब कुछ संजोत कर रखना,
एक भी मोटी ना गिरे,ऐसे जोड़ कर रखना,
दिनकर से प्रकाश लेकर,
अँधेरे को चीर देना,रात रुपी बुढी माँ से सुबह रुपी जागीर लेना,
धुल से अपनत्व लेकर,धरती माता से प्यार करना,
कचे घड़े सा टूट कर आखिर है सबको बिखरना,
नदी से बहाव लेना,राह का सुज्हाव लेना,
प्रबलता का पाठ लेना , और साब्को प्यार देना ,
पर्वतों से शांति लेकर सबको आश्रय देना , सबको प्यार , सबको एक संसार देना ,
फूलों से कोमलता लेकर सबको प्रस्सन्न कर देना , दुःख रुपी काँटों से भय को तू ख़त्म कर देना ,
बलराम सा बल रख कर , तू हर मुश्किल से भिड जाना और उस सैतान का खत्म करके ही वापस आना ,
भूल कर भी अहंकार का स्वर्ण चोला तू पहनकर मत उछलना और न किसी छोटे को तू पैरों तले कुचलना ,
माती जैसा मात्र भाव , और वृक्ष जैसी कोमल छांव तू सदा रखना अपने ह्रदय में मर्म ,
यमराज से तू योवन मांग ले , इस सोये संसार को तू एक सुन्दर राह दे ,
रावण से भक्ति का पाठ कर पर रक्षाशी प्रवृति का त्याग कर , कुछ नया प्रयास कर ,
लूट ले धन ज्ञान का , जितना मिले बटोर , जाने कब हवा बहे दूसरी ओर ,
वायु से वेग लेकर तू बेह निर्झर निर्झर , तू थक न जायेगा सफ़र कर के सात समंदर ,
समंदर सा विशाल दिल करके तू सबको अपने अन्दर उतार दे और सत्य के लिए तू सब कुछ अपना वर दे ,
शत्त्कोंन के कोण सा तू एक व्यक्ति बन मगर द्रोण सा , शमशान के मुर्दों की हड्डियां डर को वहीँ पर गाढ़ दे ,
हज़ार साल का भूल कर तू एक रात गुज़र दे ,
क्षमा सबको करना क्यूंकि गलती सभी करते हैं क्षमा वोह नहीं करते हैं जो सच्चाई से डरते हैं ,
त्रण त्रण सबकी भलाई कर , दूध पर नज़र रख मत रख नज़र मलाई पर ,
ज्ञान का भंडार भर कर तुझको रहा हूँ मैं सौंप , ईमानदारी से दूसरों में बाँटना ज्ञान का यह श्रोत .........
आवाज़,आग,आशिक,जो बन गयी आज की जनता,
एक इकबाल,इस छोटे से नाम पर करे सब बवाल,
अरे क्यों ऐसा होता है?ह से हिन्दू म से मुस्लिम होता है,
तो ये हम अलग क्यों होता है?
इमारतें बड़ी-बड़ी बनायीं लोगों ने,
खून की मेहनत लगायी मजदूरों ने,
पैसा कमाया सोषक ने,खून जलाया गरीब ने,
उल्टा पुल्टा सारा संसार,
गिरता हुआ अच्छा व्यापार और उठता हुआ काला व्यापार,
उन में वोह मजबूती नहीं रही ,
रिश्तों की कतार से सब कट गया,
न रहा बाप बाप,न भाई भाई,कोई ना रहा अपना,
सब हो गया एक डरावना सपना,
ऋषि साधू अब कोई नहीं,सब मांस सबका खाते हैं,
शाम होने पर सब मैख़ाने जाते हैं,
एलान-ऐ-ज़िन्दगी बन गयी,एक ठूंठ सी तन गयी,
कड़क इतनी हो गयी,एक हवा तो आये ये यहाँ गिरी या वहां गिरी,
ऐनक पहन के दुनिया को देखो,साफ़ नज़र नहीं आएगी,
सावधानी रखो बरकरार नहीं तो,धुल आँखों में घुस जायेगी,
ओ ईश्वर ! सुन रहा है है क्या?
देख रहा है यह अत्याचार,
यह खून खराबा,
क्यों तू चुप है?बैठा॥
कठपुतलियों को घुमा-घुमा कर तू भी खेलता है खेल,
औरत का मान सम्मान रखना ,
करता हूँ मैं गान ऐ धरती माता,
तुझसे न टूटेगा यह मेरा नाता,
अंगारे सी गर्मी भरकर,
सीने में दबाकर बैठा हूँ,
असंभव इस गरमी को प्यार की बर्फ से दबा के बैठा हूँ,
कल मिलेगा कल से बेहतर,
कर सका तो बेहतर से बहतर,न किया तो बदतर से बदतर,
खून से खेलेंगे क्या?दर्द को झेलेंगे क्या ?
नहीं ,नहीं सबका जवाब ,
सरहद पे मरने वालों का है क्या कोई हिसाब,
क्यों हैं इतने खुनी ,पापी लोग,
गलत हाथों से बना है घडा,
थोडा बचा के रखना पड़ता है,
पाप की कोख में पलने वाला हत्यारा बिना मौत के ही मरता है,
घने काले अँधेरे राह नज़र नहीं आयेगी,
एक किरण की कल्पना तो कर,राह खुद ही खुल जायेगी,
चन्दन को घिस घिस कर सर पर लगा लो खुसबू बहूत आयेगी,
पर ये चन्दन की लकड़ी बाहर की ही दुर्गन्ध मिटाएगी,
छलिया के रूप में,इस ख़ुशी की धूप में,
जहाज के पंछी के भाँती स्वछंद,उन्मुक्त,स्वतंत्र आकाश में विहार करो,
उन्मुक्त एक ऊंची उड़ान भरो,
पर संभालना प्यारे,ऊंचा जाकर निचे का भी ख्याल करना,
एक सच्चई याद रखना सबको है इक दिन मरना,
झील से प्रबलता लेकर,ऊंचाई से कूद जाना,गहरी मज़बूत चट्टानों,
को तोड़कर अपनी एक राह बनाना,
टूट ना जाना मिश्किल हालत में,
जब कोई ना हो तेरे साथ में,
बस हिम्मत रखना हाथ में,
तब किस्मत भी रहेगी तेरे साथ में,
ठंडी बर्फ की चादर सा बिछ जाना विडाल,विशाल पहाड़ियों पर,
दूर सूनी राहों पर यूं ही कर लेना सफ़र,
डगमगाना नहीं,घबराना नहीं,सब समझ कर ख्वाब,करना एक सही राह का चुनाव,
ढीला भी थोडा बन कर रहना,कभी कभी दर्द भी सहना,
क्योंकि साहस है गहना,तो धैर्य है ढाल,
तलवार से ढाल लेकर,यह सारा संसार देखकर,
तू मत घबराना,तुझे हटाने के लिए खुद विधाता को पड़ेगा आना,
थाल अम्बर सा बनकर,सब कुछ संजोत कर रखना,
एक भी मोटी ना गिरे,ऐसे जोड़ कर रखना,
दिनकर से प्रकाश लेकर,
अँधेरे को चीर देना,रात रुपी बुढी माँ से सुबह रुपी जागीर लेना,
धुल से अपनत्व लेकर,धरती माता से प्यार करना,
कचे घड़े सा टूट कर आखिर है सबको बिखरना,
नदी से बहाव लेना,राह का सुज्हाव लेना,
प्रबलता का पाठ लेना , और साब्को प्यार देना ,
पर्वतों से शांति लेकर सबको आश्रय देना , सबको प्यार , सबको एक संसार देना ,
फूलों से कोमलता लेकर सबको प्रस्सन्न कर देना , दुःख रुपी काँटों से भय को तू ख़त्म कर देना ,
बलराम सा बल रख कर , तू हर मुश्किल से भिड जाना और उस सैतान का खत्म करके ही वापस आना ,
भूल कर भी अहंकार का स्वर्ण चोला तू पहनकर मत उछलना और न किसी छोटे को तू पैरों तले कुचलना ,
माती जैसा मात्र भाव , और वृक्ष जैसी कोमल छांव तू सदा रखना अपने ह्रदय में मर्म ,
यमराज से तू योवन मांग ले , इस सोये संसार को तू एक सुन्दर राह दे ,
रावण से भक्ति का पाठ कर पर रक्षाशी प्रवृति का त्याग कर , कुछ नया प्रयास कर ,
लूट ले धन ज्ञान का , जितना मिले बटोर , जाने कब हवा बहे दूसरी ओर ,
वायु से वेग लेकर तू बेह निर्झर निर्झर , तू थक न जायेगा सफ़र कर के सात समंदर ,
समंदर सा विशाल दिल करके तू सबको अपने अन्दर उतार दे और सत्य के लिए तू सब कुछ अपना वर दे ,
शत्त्कोंन के कोण सा तू एक व्यक्ति बन मगर द्रोण सा , शमशान के मुर्दों की हड्डियां डर को वहीँ पर गाढ़ दे ,
हज़ार साल का भूल कर तू एक रात गुज़र दे ,
क्षमा सबको करना क्यूंकि गलती सभी करते हैं क्षमा वोह नहीं करते हैं जो सच्चाई से डरते हैं ,
त्रण त्रण सबकी भलाई कर , दूध पर नज़र रख मत रख नज़र मलाई पर ,
ज्ञान का भंडार भर कर तुझको रहा हूँ मैं सौंप , ईमानदारी से दूसरों में बाँटना ज्ञान का यह श्रोत .........
स्वर्गीय कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा "जन गण मन" के नाम से प्रख्यात शब्दों और संगीतकी रचना, भारत का राष्ट्रगान है। इसे इस प्रकार पढ़ा जाएगा:
जन-गण-मन अधिनायक, जय हे
भारत-भाग्य-विधाता,
पंजाब-सिंधु गुजरात-मराठा,
द्रविड़-उत्कल बंग,
विन्ध्य-हिमाचल-यमुना गंगा,
उच्छल-जलधि-तरंग,
तव शुभ नामे जागे,
तव शुभ आशिष मांगे,
गाहे तव जय गाथा,
जन-गण-मंगल दायक जय हे
भारत-भाग्य-विधाता
जय हे, जय हे, जय हे
जय जय जय जय हे।
उपरोक्त राष्ट्र गान का पूर्ण संस्करण है।
इसकी कुल अवधि लगभग 52 सेकंड है और इसे 49 से 52 सेकंड के बीच में भी गाया जाना चाहिए।
राष्ट्रगान का अर्थ
जन गण मन अधिनायक जय हे,
(हे भारत के जन गण और मन के नायक (जिनके हम अधीन हैं))
भारत-भाग्य-विधाता
(आप भारत के भाग्य के विधाता हैं)
पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा,
(वह भारत जो पंजाब, सिंध, गुजरात, महाराष्ट्र)
द्वाविड़, उत्कल, बंग
(तमिलनाडु, उड़ीसा, और बंगाल जैसे प्रदेश से बना है)
विन्ध्य, हिमाचल, यमुना-गंगा,
(जहाँ विन्ध्याचल तथा हिमालय जैसे पर्वत हैं और यमुना-गंगा जैसी नदियाँ हैं)
उच्छल जलधि तरंगा
(और जिनकी तरंगे उच्छश्रृंखल होकर उठतीं हैं)
तव शुभ नामे जागे
(आपका शुभ नाम लेकर ही प्रातः उठते हैं)
तव शुभ आशिष माँगे
(और आपके आर्शीवाद की याचना करते हैं)
जन-गण-मंगलदायक जय हे,
(आप हम सभी जनों का मंगल करने वाले हैं, आपकी जय हो)
गाहे तव जयगाथा,
(सभी आपकी ही जय की गाथा गायें)
जन-गण-मंगलदायक जय हे
(हे जनों का मंगल करने वाले आपकी जय हो)
भारत भाग्य विधाता
(आप भारत के भाग्य विधाता हैं)
जय हे, जय हे, जय हे,
(आपकी जय हो, जय हो, जय हो)
जय, जय, जय, जय हे
(जय, जय, जय, जय हो)
(हे भारत के जन गण और मन के नायक (जिनके हम अधीन हैं))
भारत-भाग्य-विधाता
(आप भारत के भाग्य के विधाता हैं)
पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा,
(वह भारत जो पंजाब, सिंध, गुजरात, महाराष्ट्र)
द्वाविड़, उत्कल, बंग
(तमिलनाडु, उड़ीसा, और बंगाल जैसे प्रदेश से बना है)
विन्ध्य, हिमाचल, यमुना-गंगा,
(जहाँ विन्ध्याचल तथा हिमालय जैसे पर्वत हैं और यमुना-गंगा जैसी नदियाँ हैं)
उच्छल जलधि तरंगा
(और जिनकी तरंगे उच्छश्रृंखल होकर उठतीं हैं)
तव शुभ नामे जागे
(आपका शुभ नाम लेकर ही प्रातः उठते हैं)
तव शुभ आशिष माँगे
(और आपके आर्शीवाद की याचना करते हैं)
जन-गण-मंगलदायक जय हे,
(आप हम सभी जनों का मंगल करने वाले हैं, आपकी जय हो)
गाहे तव जयगाथा,
(सभी आपकी ही जय की गाथा गायें)
जन-गण-मंगलदायक जय हे
(हे जनों का मंगल करने वाले आपकी जय हो)
भारत भाग्य विधाता
(आप भारत के भाग्य विधाता हैं)
जय हे, जय हे, जय हे,
(आपकी जय हो, जय हो, जय हो)
जय, जय, जय, जय हे
(जय, जय, जय, जय हो)
Class IX Megh Aaye




